Tuesday, January 17, 2023

मर रहा है मीडिया

देश में मैनस्ट्रीम मीडिया मर रहा है... क्या अखबार, क्या न्यूज चैनल सब अस्ताचलगामी हैं... सामांतर मीडिया और सोशल मीडिया कभी विश्वसनीय रहे ही नहीं...  इन दिनों मीडिया का मूल रूप से ब्रेशवाश टूल की तरह इस्तेमाल हो रहा है । जिसे कारपोरेट और पालिटिकल पावर का गठजोड़ गवर्न कर रहा है। सूचना और समाचार विश्लेषण का माध्यम बनने वाला मीडिया मास कम्युनिकेशन की ताकत की बदलौत पालिटिकल माइंड मेकअप, ब्रेनवाश के साथ तथ्यों पर परदा डालते हुए नफरत-अलगाव और भ्रम फैलाने का हथियार बना हुआ है। इसका सबसे बड़ा शिकार दो कम्युनिटी हुई हैं, जिसमें पहले नंबर पर मुस्लिम और दूसरे पर दलित-आदिवासी हैं। दरअसल इस वर्ग का मैनस्ट्रीम मीडिया में प्रतिनिधित्व नहीं के बराबर है, शायद इसी वजह से मुझ तक सालों से ये बात मदद के लिए आती रही है कि हमारा ( मुस्लिम-दलित बहुजन) का अपना सशक्त मीडिया होना चाहिए।
इस छटपटाहट में कितना दम है केवल इस बात से समझा जा सकता है कि  देश भर में नफरती भाषणों की घटनाओं पर अंकुश लगाने और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग करने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही न्यायमूर्ति केएम जोसेफ और न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना की पीठ ने टीवी समाचार सामग्री पर नियामकीय नियंत्रण की कमी पर अफसोस जताते हुए नफरत फैलाने वाले भाषण को 'बड़ा खतरा' बताया है। साथ ही कहा है प्रिंट मीडिया के विपरीत, समाचार चैनलों के लिए कोई भारतीय प्रेस परिषद नहीं है।  कहा,मीडिया के लोगों को समझना चाहिए कि जिसके खिलाफ अभी भी जांच चल रही है और उसे बदनाम नहीं किया जाना चाहिए। हर किसी की गरिमा होती है।
अदालती चिंता के बीच मेरा मानना है अगर हालात ऐेसे ही रहे तो आने वाला वक्त कम्युनिटी मीडिया का होगा। उसका आकार और व्यहवार कैसा होगा ये भी वक्त और हालात तय करेंगे...
देवेश कल्याणी
9827205219

Thursday, January 31, 2019

मीडिया एक्सपोज, ब्रेनवॉश का नया टूल फिल्में 

 

काहे का बिग गन... वो तो साला दलाल है। डील मिले तो कुछ भी बेच सकता है... इथिक्स-विथिक्स चीज क्या है? ये शब्द देश की राजधानी दिल्ली के बड़े पत्रकार और मीडिया मैन कहलाने वाले एक नहीं कई लोगों के लिए जुमले की तरह पिछले कई सालों से इस्तेमाल हो रहे थे। सीन तब चेंज होने लगा जब छुटभैये तक रेटकार्ड में जगह पा गए और दर्शकों से लेकर पाठकों तक में सब एक्सपोज होने लगे। प्रायोजित खबरें - मुद्दों के पक्ष-विपक्ष में एकतरफा तेवर- कलेवर और भाषा  के बेखौफ इस्तेमाल ने उनकी साख को मटियामेट कर दिया... जिनके लिए उन्होंने अपना सब-कुछ  दांव पर लगाया, अब वे ही भाव गिराएंगे... इसकी बकायदा शुरुआत हो चुकी है... जरा गौर करेंगे तो सब साफ हो जाएगा। 
लोकसभा का चुनाव सम्मुख है और एक ही हफ्ते में चार ऐसी फिल्में थियेटर में धूम मचा रही हैं, जिनके पीछे का पॉलिटिकल एजेंडा आसानी से नजर आ जाता है... दक्षिणपंथी विचारधारा के राष्ट्रवाद को उरी द सर्जिकल स्ट्राइक और मणिकर्णिका से पोषण मिलेगा इससे कौन इनकार कर सकता है। यह सकारात्मक रूप से दर्शकों के माइंड मेकअप करने का अघोषित और अप्रत्यक्ष हल्ला बोल है... इसके लिए भाजपा और उससे जुड़े दलों के नेताओं के थियेटर में पहुंचने राष्ट्रगान गान, हाऊ इज जोश और भारत माता की जय जैसे उद्घोष इसकी पुष्टि भी करते हैं। वहीं सामांतर ही दोहरी धार के रूप में प्रतिद्वंद्वी पक्ष की नकारात्मक छवि स्थापित करने के लिए भी एक और फिल्म थियेटर में टिकी हुई है जिसका नाम एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर है। इनके बीच एक और अप्रत्याशित हिंदी फिल्म है बाल ठाकरे जो इस थ्योरी पर मोहर लगाती है कि सियासत का यकीन मीडिया, उसके मैनेजर और लाइजनर्स से उठ रहा है। 
मराठी भाषी क्षेत्र के सबसे सशक्त सियासी हस्ताक्षरों में से एक बाला साहेब ठाकरे को हिंदी भाषा में किन लोगों के बीच कहां तक,किस स्वरूप में और क्यों पहुंचाया जा रहा है यह बहुत साफ है। इसमें कोई राकेट साइंस जैसी पेचीदगी नहीं है। यह सब अचानक नहीं हुआ है। इससे पहले शुद्र द राजजिंंग जैसी विचारधारा पोषित फिल्में बनी, सेंसर में फंसी और अंत में सिनेमाघरों में प्रदर्शित होने में नाकाम रही। बेशक ये फिल्म व्यावसायिक रूप में बहुत नुकसानदेह रही, लेकिन इसकी पायरेटेड कॉपी और बस्तियों में प्रोजक्टर शो ने सियासत की आंखें चौंधिया कर रख दी। एससी एसटी एट्रोसिटी एक्ट पर बीते साल सुप्रीम कोर्ट की व्यवस्था के बाद मचे बवाल के बाद यह इतनी तेजी से सर्कुलेट हुई और वंचित समुदायों के एकीकरण का बड़ा माध्यम बनी। सियासी पंडित स्वीकार करते हैं कि वर्ग चेतना की वजह से ग्वालियर-चंबल अंचल में दक्षिणपंथी विचारधारा को वोटों के रूप में बड़ा झटका सहन करना पड़ा। 
इनके साथ ही द गाजी अटैक, परमाणु, टॉयलेट एक प्रेमकथा, पैडमैन, सुई-धागा जैसी कई फिल्में प्रत्यक्ष तौर पर सरकारों के कार्यक्रमों की वाहक और उनकी इमैज बिल्डिंग का चोखा टूल साबित हुई हैं... नए साल में जो फिल्में रिलीज हुई हैं इनका डाटा एनालिसिस आने वाले दिनों में सिनेमा और मीडिया का भविष्य तय करेगा। अगर यह दर्शकों के साथ निर्माता-निर्देशकों को तृप्त करने में कामयाब रही तो मीडिया को मिलने वाला सियासत का विज्ञापन शेयर अभी और नीचे जाने वाला है। अभी तक ऐसी फिल्में मेकर्स के लिए दाल-रोटी चलाने और संबंध बढ़ाने वाली थी। बाक्स आॅफिस की कसौटी पर उन्हें एक बड़ी हिट का इंतजार था। उरी द सर्जिकल स्ट्राइक ने ये ख्वाब भी पूरा कर दिया है। रिपोर्ट्स कहती हैं कि इस यह फिल्म 200 करोड़ के क्लब में शामिल हो रही है जहां अभी तक व्यावसायिक सिनेमा और खान एक्टर्स का एकतरफा बोलबाला रहा है। मणिकर्णिका भी कतार में है... हां एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर का नकारात्मक मैसेज दर्शकों ने ठुकरा दिया है वहीं ठाकरे महाराष्ट्र के बाहर रंग नहीं जमा सकी है। 
दरअसल मनोरंजन उद्योग की नई भूमिका और मीडिया इंडस्ट्री का पराभव सूचना उद्योग में बहुत बड़े बदलाव की अनसुनी दास्तां है। 19 वीं शताब्दी के बाद दुनिया के नक्शे पर शायद ही ऐसा कोई देश हो जहां मिशनरी मीडिया ने परिवर्तन, क्रांति और बदलाव का मार्ग प्रशस्त न किया हो। अधिकांश बड़े लीडर्स बैरिस्टर और पत्रकार रहे फिर चाहे वह अंबेडकर हों या महात्मा गांधी। पश्चिमी देशों में तो अब भी मीडिया जनमत को प्रभावित करने की ताकत रखता है। यही ताकत देश के मेनस्ट्रीम और वर्नाकुलर मीडिया में भी थी, लेकिन बाजार के दबाव में समझौतों ने मीडिया को इंडस्ट्री का दर्जा दिलाया और उसकी ताकत को मरोड़कर भी रख दिया। इसके बाद सूचना क्रांति और इंटरनेट के उपयोग ने रही सही कसर भी पूरी कर दी। फेसबुक, इंस्टाग्राम और वाट्सअप जैसे एप्स ने टारगेटेड ग्रुप्स में इतनी मारक सूचनाओं का मार्ग प्रशस्त किया कि वह माइंड मेकअप का सबसे सशक्त औजार बन गई। मिस्त्र जैसे देश में तो यह तख्तापलट और क्रांति का भी कारण बनी। जब सरकारें इससे परेशान हुईं और उन्होंने इसे इस्तेमाल करना चाहा तो पिछले पांच सालों में प्रोफेशनल इस माइंड गेम में दाखिल हो गए और देखते ही देखते सच्ची-झूठी सूचनाओं के संजाल से यह माध्यम भी इतना दूषित हो गया कि इसकी विश्वसनीयता खत्म हो गई। इसके बाद एक बार फिर मेनस्ट्रीम मीडिया का ही सहारा था लेकिन वहां के बिकाऊ माहौल और उसके एक्सपोज होने के बाद अब नए टूल की जरूरत थी जो लोगों को सियासी सपोर्ट के लिए चार्ज और ब्रेनवाश कर सके। इस कसौटी पर फिल्में खरी उतर रही हैं और यह सिलसिला जारी रहा तो मेनस्ट्रीम मीडिया को और बुरे दिन देखने होंगे।

 

ये आर्तनाद क्यों..? बरस-बरस मैं चाहूं जीना...

ये आर्तनाद क्यों..? बरस-बरस मैं चाहूं जीना...

मौजूदा हालातों में सवाल उस कालिख का नहीं है जो आरोपों के रूप में बी चंद्रकला पर लगी है या मेघालय में जान गंवाने वाले मजदूरों के रूप में खनन उद्योग पर है। असल सवाल तो सरकार और सियासत समेत उन संस्थाओं पर जिनके बारे में देश को यह भ्रम है कि वह देश के प्रत्येक नागरिक के लिए चौकीदार, वॉच डॉग और गार्ड क्ष गार्जियन की भूमिका में हैंं। चाहे सबसे अभिजात्य आईएएस अफसरों के कुनबे की संस्था हो,  मेन स्ट्रीम मीडिया हो या शेष सियासी दल, कहीं से भी न तो चंद्रकला के लिए आवाज सुनाई दी, न ही मेघालय में जिंदा रहने की जंग में जान गंवाने वाले मासूम श्रमिकों के लिए... 



रे रंगरेज तू रंग दे मुझको, 
बरस-बरस मैं चाहूं जीना ।। 
चुनावी छापा तो पडता रहेगा,लेकिन जीवन के रंग को क्यों  फीका किया जाए, दोस्तों ... सीबीआई छापों में घिरीं यूपी कैडर की चर्चित आईएएस बी चंद्रकला फिलहाल बेशक स्टडी लीव पर हैं, लेकिन इस शायराना अंदाज से फिर सुर्खियों में हैं। सपा के शासन में उन्हें हमीरपुर, बुलंदशहर, मेरठ सहित पांच प्रमुख जिलों में डीएम बनने का मौका मिला था। फिर यूपी में योगी सरकार बनते ही वह ऐच्छिक प्रतिनियुक्ति पर दिल्ली चली गईं थीं और जब लौटीं तो सीबीआई और अब ये आर्तनाद सामने है... एक ऐसी ही दर्दभरी कसमसाहट मेघालय से भी सुनाई दे रही है जहां ईस्ट जयंतिया हिल्स जिले में 13 दिसंबर 2018 को एक अवैध रैटहोल खदान में अचानक पानी भर जाने से 15 खनिकों के अंदर फंस जाने की घटना को पूरे एक माह बाद एक शव मिला है और शेष के शव मिलने तक की उम्मीद क्षीण हो चली है। कथित रूप से देश में सबसे लंबे चलने वाले इस अभियान पर कलंक है कि इसमें मजदूरों को बचाने की कारगर कोशिश नहीं की गई। क्योंकि यहां माइनिंग का मुद्दा सरकार बदल सकता है इसलिए किसी सियासी दल के कान पर जूं नहीं रेंगी और रही सही कसर मेनस्ट्रीम के उस मीडिया की चुप्पी ने पूरी कर दी जो प्रिंस के बोरवेल में गिरने पर घंटों लाइव दिखता है या थाइलैंड में छात्रों के ऐसी ही सुरंग में फंसने के बाद टीआरपी के लिए सक्रिय हो गया था। 
दोनों घटनाओं में बेशक कोई मेल न हो, लेकिन इनमें सियासत के महीन रेशमी फंदे आसानी से नजर आते हैं जो इन्हें एक जैसा रंग देते हैं। सोशल मीडिया के लाइक्स , लेडी दबंग जैसी उपमाओं में नेताओं और अभिनेताओं को मात देने वाली आईएएस बी. चंद्रकला खनन घोटाले में घिरने के  बावजूद  प्रेरक कहानी है... चाहे अभी खनन आरोपों का अंतिम सच बाहर आना बाकी है। ...27 सिंतबर 1979 को मौजूदा तेलंगाना के करीमनगर में अनुसूचित जनजाति के परिवार में जन्मी चंद्रकला स्कूली पढ़ाई में ही लड़खड़ा गई थीं और उनकी शादी कर दी गई  मगर उन्होंने हार नहीं मानी और  डिस्टेंस लर्निंग से पोस्ट ग्रेजुएशन तक पढ़ाई कर संघ लोकसेवा आयोग की परीक्षा में सफलता हासिल की। उनके पिता बी. किशन रामागुंडम स्थित फर्टिलाइजर कॉपोर्रेशन आॅफ इंडिया में वरिष्ठ टेक्नीशियन से सेवानिवृत्त हैं जबकि मां  बी. लक्ष्मी और बहन बी. मीना उद्यमी हैं। आईएएस की नौकरी दबंग अंदाज में करने के दौरान उन आरोप लगे कि वह सरकार के एजेंट की तरह काम कर रही हैं। इस आरोप के साथ ही यह साफ हो गया था कि अगर यूपी में सरकार बदली तो बी चंद्रकला के कार्यकाल को खंगाला जा सकता है। लेकिन उन पर जो आय से अधिक संपत्ति के आरोप हैं वह चंद्रकला की पृष्ठभूमि को देखते हुए राजनीति प्रेरित होने के आसार हैं। शायद इसीलिए उनकी कविता के भावार्थों  में सियासत में फंसी योद्धा के हौसले और आर्तनाद का संगम दिखता है। 
...उधर मेघालय में भी एक ऐसा ही आर्तनाद सैकड़ों फुट गहरी चुहेदानी जैसी कोयला सुरंगों में कहीं दफन हो गया है। यहां कहा जाता है कि आदिवासी बहुल इस इलाके में नेपाल, बांग्लादेश और असम से बालश्रमिक आते हैं। जयंतियां पहाड़ियों के आसपास करीब 70 हजार बच्चे रैट माइनिंग का काम करते हैं, लेकिन इनकी राष्ट्रीयता, जाति, नस्ल और गरीबी और ऐसी जानलेवा गरीबी (मजबूरी) के बारे  में कोई अधिकृत आंकड़े आज तक मौजूद नहीं हैं। पिछले महीने, मेघालय में अवैध खनन में नेताओं की भूमिका के खिलाफ आवाज उठाने वाली सामाजिक कार्यकर्ता एग्नेस खारशिंग और उनकी सहयोगी अनिता संगमा पर हमला हुआ था। एग्नेस बिस्तर पर हैं लेकिन वे कहती हैं, 'मेरे पास ऐसे सबूत हैं जिससे यह आरोप पुष्ट हो रहा है कि सरकार की जानकारी में ही ये अवैध कोयला खदानें चल रही हैं। एग्नेस पर हमले और खदान में हुए हादसे के बाद सरकार घिरी हुई नजर आ रही है, क्योंकि  मेघालय में कोयला खनन का मुद्दा सरकार पलटने की कूवत रखता है। कहते हैं यहां चुनाव में कांग्रेस इसीलिए हारी क्योंकि उसने एनजीटी का बैन हटवाने के लिए कुछ नहीं किया। हालांकि भाजपा की गठबंधन सरकार भी इसमें कुछ नहीं कर पाई है, बल्कि आरोप यह लगने लगे हैं कि भाजपा की गठबंधन की सरकार की शह के कारण अवैध खनन में बढ़ोत्तरी हुई है। 
मौजूदा हालातों में सवाल उस कालिख का नहीं है जो आरोपों के रूप में बी चंद्रकला पर लगी है या मेघालय में जान गंवाने वाले मजदूरों के रूप में खनन उद्योग पर है। असल सवाल तो सरकार और सियासत समेत उन संस्थाओं पर जिनके बारे में देश को यह भ्रम है कि वह देश के प्रत्येक नागरिक के लिए चौकीदार, वॉच डॉग और गार्ड गार्जियन की भूमिका में हैंं। चाहे सबसे अभिजात्य आईएएस अफसरों के कुनबे की संस्था हो,  मेन स्ट्रीम मीडिया हो या शेष सियासी दल, कहीं से भी न तो चंद्रकला के लिए आवाज सुनाई दी, न ही मेघालय में जिंदा रहने की जंग में जान गंवाने वाले मासूम श्रमिकों के लिए... बाद में अगर चंद्रकला निर्दोष साबित हो भी जाएं तो क्या उनकी छविभंग की भरपाई करना संभव होगा? क्या उनका वह दंबग कौशल बरकरार रह पाएगा या वे भी सियासत के साथ पटरी बैठाने वाली जमात का हिस्सा बन कर लचर ढर्रे का हिस्सा बन जाएंगी? क्यों ऐसा नहीं हो सकता कि केस झूठे साबित होने के बाद शिकायतकर्ता और जांच अधिकारी को सजा हो और वोट के लालच में सियासत इतनी अंधी न हो सके कि किसी मासूम को जान गंवाना पड़े।


Monday, March 26, 2018

सत्ता कब्जाने वंचित वर्गों से साजिश

बहुत बेचैनी है... सोशल रिसर्चर्स और वंचित वर्गों के थिंक टैंक में। शासन-प्रशासन के संस्थागत परिवर्तन और कोर्ट के फैसलों से जुड़ती कड़ियां अंधियारी तस्वीर बना रहीं हंै। योजना आयोग समेत प्रशासनिक व्यवस्था तथा शिक्षा के ढांचे में बदलाव जैसे सियासी फैसलों के बीच तीन तलाक और एससी-एसटी एक्ट में शिथिलता जैसे अदालती फैसले आए हैं। इससे जहां अनुसूचित जातियों को अस्पृश्यता के दंश याद आ रहे हैं, वहीं मुस्लिम समुदाय में यह संदेश उपजा है कि उनके घर में सियासत ने तीन तलाक के दांव से लैंगिक आधार पर बंटवारा हो गया है। इनके अलावा पिछड़े वर्गों की कई कमजोर जातियां भी धुंधलके में हैं।
संविधान से धाार्मिक स्वतंत्रता के उत्सव और अवसर मिलने से अस्पृशयता वाली पहचान को भूलने वाली अनुसूचित जातियां परसंस्कृतिकरण का पर्याय बन बन चुकी हैं। इनमें से अधिकांश अपने आप को सबसे बेहतर हिंदू साबित करने में सत्ताभेदी सियासी राष्ट्रवाद का हिस्सा भी बन रही हैं। लेकिन ये भूल गए कि अंग्रेजों द्वारा 1872 में पहली जनगणना के बाद से अस्पृश्य जातियों को हिंदुत्व में शामिल करने का सिलसिला शुरू हुआ था जो 1931 की जातिगणना आने तक व्यापक स्वरूप में आ चुका था, जिसमें सबसे घृणित सफाईपेश जाति को वाल्मिकी नाम दिया गया जो संख्या के लिहाज से इस वर्ग में दूसरे नंबर पर थी। इसके  अलावा कई सदियों से सताई गईं ये जातियां जब संचार माध्यमों के जरिए एकत्र हो कर शक्तिपुंज बनने लगीं तो उनकी सामाजिक मर्यादा सुनिश्चित करने वाले अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के प्रावधान सुप्रीम कोर्ट ने इतने लचीले कर दिए हैं कि उसके औचित्य पर ही सवाल उठने लगे हैं। यानी लगभग एक चौथाई आबादी ऐसे संक्रमणकाल में दाखिल हो गई है जहां वे सदियों की यातना भूल रहे थे पर आगे का रास्ता अंधियारा होता जा रहा है। चाहे लक्ष्मणपुर बाथे नरसंहार हो या, मिर्चपुर गोहाना या खैरलांजी, यहां दमन का शिकार दलित न्याय से वंचित ही रहे हैं।  शंका है कि जब एससी-एसटी एक्ट के इतने सख्त प्रावधान  होने के बाद भी सजा का प्रतिशत एक चौथाई भी न हो तब आगे क्या होगा? क्या गारंटी कि संविधान से मिले अधिकार प्रभावित नहीं होंगे, जिनमें शामिल है अनुच्छेद 14 : विधि के समक्ष समता। अनुच्छेद 15 : धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर विभेद प्रतिषेध । अनुच्छेद 17 : अस्पृश्यता का अंत। अनुच्छेद 21 : प्राण- दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण। अनुच्छेद 23 : शोषण के विरूद्ध अधिकार।
दरअसल इनके अलाव भी देश की कुल आबादी का दो तिहाई वंचित वर्ग 21 वीं शताब्दी में भी रोटी-कपड़ा मकान जैसी मूलभूत जरूरतों के सियासी खिलौना बने हुए हैं। वैश्विकरण और सूचना क्रांति के बाद उपजे नए अवसरों के बीच मनरेगा से शुरू कहानी, भोजन के अधिकार से होते हुए प्रधानमंत्री आवास और स्वच्छता और शौचालय निर्माण के अध्याय तक आ चुकी है। लेकिन यह मूल सवाल यहां से गायब हो चुका है कि आजादी के इतने सालों बाद तक इन्हें समाज की मुख्यधारा में लाकर स्वयं सक्षम क्यों नहीं बनाया जा सका। ये इनके खिलाफ षड़यंत्र था या सरकारों की निर्योग्यता? हालात ये हैं कि रोटी-कपड़ा मकान और धर्म में मशगूल ये वर्ग उस शिक्षा से महरूम है जो इन्हें शेष आबादी के साथ अवसरों की प्रतियोगिता में खड़ा कर सके।
शिक्षा का सरकारी स्कूली तंत्र देशभर में भरभरा रहा है, जबकि उच्च शिक्षा में अब भी सरकारी संस्थान सर्वोत्कृष्ट बने हुए हैं। इससे स्कूली स्तर पर ही इस वर्ग की अधिकांश छात्र आबादी ड्रॉपआउट हो रही है। जो बचते हैं उन्हें उच्च शिक्षा और अवसरों की प्रतियोगिता के लिए औसत योग्यता के कारण कड़ी चुनौतियों से जूझना पड़ रहा है। दूसरी और बाजारवाद और वैश्विकरण के दबाव से मुक्त जेएनयू जैसे संस्थान सामाजिक शोधादि से इन वर्गों में एक चेतना का निर्माण कर रहे हैं, जिसमें कन्हैया कुमार या शेहला रशीद जैसे छात्र वंचित वर्गों के यूथ आइकन बन रहे हैं, मगर अब 52 विश्वविद्यालय सरकारी सरपरस्ती से महरूम होंगे और सामाजिक शोध के बजाए बाजार के मुताबिक संचालित हो सकेंगे। क्योंकि शिक्षा में आमूलचूल परिवर्तन के लिए कस्तूरीरंजन कमेटी की रिपोर्ट जल्द ही पेश कर लागू करने की तैयारी है जिसमें गुणात्मक और कौशलविकास शिक्षा रिटर्न आॅफ मैकाले कही जा सकती है।
मौजूदा परिस्थिति में असमानता की खाई गहरी होने की आशंका है। चाहे वह शिक्षा और रोजगार के अवसर हों या कानून के समक्ष बराबरी का या जातीय अस्मिता का। ऐसे में देश के सभी समुदाय एक-दूसरे के प्रति शक शुबहे के भाव से ग्रसित हो सकते हैं। जबकि वास्तविकता में इससे किसी समूह वर्ग या जाति को कोई सीधा बड़ा फायदा नहीं मिल रहा। क्योंकि शासकीय स्तर के अवसर जनसंख्या के अनुपात में किसी समुदाय को ईकाई प्रतिशत में भी लाभ देने की स्थिति में नहीं है। लेकिन संदेश यही है कि दूसरे समुदाय उनके हक में सेंध लगा रहे हैं, इसमें असमानता की खाई फैलेगी। जहां वंचितों की सत्ता-अवसरों में भागीदारी और सामाजिक न्याय सबसे निचले आभासी स्तर पर होगा।

Friday, January 22, 2016

दबाव समूहों के नवसामंत

 हम प्रभावशाली दबाव समूहों के नवसामंतों के युग में जी रहे हैं जो आपके निर्णयों को नियंत्रित करने के लिए कुछ भी रचने को बेकरार रहते हैं। इसे स्थापित करता है  जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में फिल्म निर्माता करन जौहर का 'इंटॉलरेन्स' के मुद्दे पर उठाया सवाल।  करन ने कहा, 'आप अपनी जिंदगी के बारे में बोलने पर भी जेल में जा सकते हैं. तो फिर अभिव्यक्ति की आजादी का मतलब ही क्या है? इसका मतलब तो यह हुआ कि अभिव्यक्ति की आजादी हमारे देश में सबसे बड़ा मजाक है और लोकतंत्र दूसरा बड़ा मजाक करन ने ये बात बेशक फिल्मी दुनिया के संदर्भ में कही होगी, लेकिन अगर आप इसे रोहित वेमुला केस से जोड़ कर देखेंगे तो आप पाएंगे कि जो बात मैंने कल आर्टिकल में लिखी है ये उसके समर्थन का एक अलग सा चेहरा है... रोहित की जान ही इसलिए गई कि उसने अभिव्यक्ति की आजादी को इस्तेमाल करने की कोशिश की थी।

Thursday, January 21, 2016

अनसुना कर ‘औकात’ बताना छोड़िए...

किसी मुद्दे को खत्म करने की ऐसी सियासी तड़प शायद ही पहले कभी देखी गई होगी। मंत्रियों और कुलपति को भाजपा की क्लीनचिट के तुरंत बाद मानव संसाधन मंत्री स्मृति इरानी ने अपने बयान से यह स्थापित करने की कोशिश की है कि रोहित वेमुला की खुदकुशी की वजह उसका दलित होना नहीं था। इस प्रकरण की कड़ियों को तथ्यों और जातियों से परिभाषित करने में  ऐसा पूर्वाग्रही एकालाप सुनाई दिया जो सोलहवीं- सत्रहवीं शताब्दी की मानसिकता का परिचय देता है। बंधुत्व,समानता या प्रजा जैसे शब्द और वर्ग जरूरतों और लक्ष्यों के मुताबित इस्तेमाल किए जाते हैं, जिसमें सुनवाई और न्याय, प्रभावशाली दबाव समूह के कारण नौटंकी बन कर रह जाता है। अनसुनी से ध्वनित होता है कि सुनवाई के लिए जिस हैसियत और औकात की जरूरत है वह तुम्हारे वर्ग की नहीं है।
रोहित वेमुला के लिए खुदकुशी आसान विकल्प था क्योंकि वह व्यवस्था से लड़ रहा था और उस पर जिम्मेदारियों का बोझ भी था। अगस्त 2015 की जिस फिल्म ‘मुजफ्फर नगर अभी बाकी है’ के प्रदर्शन को लेकर दलित बनाम दलित विरोधी संघर्ष शुरू हुआ उसमें कोई दलित मांग नहीं थी। बल्कि यह दलित छात्रों के समुदाय द्वारा अपने अधिकारों को स्थापित करने की चेष्ठा थी। यह ऊंचे सुर में बराबरी और वंचित एकता का उद्घोष था। इसे खामोश करने के लिए इतने स्तरों पर निष्ठुरों का पूरा वर्ग एकजुट हो कर इस जिद और जुनून को दबाने में लामबंद हुआ कि उस अंधे कुंए से आवाज बाहर लाने के लिए वेमुला को खुदकुशी करना पड़ी। हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी ने रोहित और उनके चार साथियों को न केवल होस्टल से निकाला बल्कि यूनिवर्सिटी में कई जगह जाना भी प्रतिबंधित कर दिया। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् ने इसमें मंत्री बंडारू दत्तात्रेय को यह समझाया कि इन अंबेडकरवादियों की गतिविधियां राष्ट्रद्रोही हैं, जिसे उन्होंने बकायदा पत्र के माध्यम से मानव संसाधन मंत्रालय को भेज दिया बगैर उनके संगठन का पक्ष जाने, इस पर मानव संसाधन मंत्रालय की अति सक्रियता कुछ ऐसी कि छह सप्ताह में पांच पत्र लिखे गए और आरोपित दलित छात्रों को आरोप मुक्त करने वाले कुलपति को बदलते ही नए कुलपति ने उन्हें नैसर्गिक न्याय से वंचित कर सीधी सजा सुना दी। न्याय के लिए  हाईकोर्ट तक उनकी हर पुकार अनसुनी रही और दलितों के नाम पर दुकानदारी करने वाले बड़े लोग खामोश और छोटे बेखबर बने रहे। अकेले लड़ने से हारे रोहित के जान देने के बाद सोशल मीडिया ने स्मृति को मनु स्मृति रानी बताया तो उनके बयान को झूठा बताते हुए दस दलित प्रोफेसरों ने इस्तीफे की पेशकश की है। लेकिन बड़े-बड़े दलित नरसंहारों और उसके बाद किसी को भी सजा न होने पर खामोशी रहने वाले अन्य जातीय या सामाजिक संगठन अब भी मूकदर्शक हैं।
ये अनदेखी और अनसुनी पिछले दस-पंद्रह सालों में लगातार बढ़ी है।  सामुदायिकता और सामुहिकता के नाम पर सबसे वंचित समुदायों के वास्तविक वंचितों के सवाल गुम होते जा रहे हैं, लेकिन अत्याचार और भेद का आधार वही जन्म है, जिसका जिक्र अपने सुसाइड नोट में रोहित वेमुला ने किया है कि मेरी जाति की मेरी मौत का कारण है... रोहित के सुसाइट नोट के कुछ वाक्य तो इस परिप्रेक्ष्य में दहला देने के लिए पर्याप्त हैं। ...मैं अपनी आत्मा और देह के बीच खाई को बढ़ता हुआ महसूस कर रहा हूं... एक इंसान की कीमत , उसकी पहचान एक वोट एक संख्या, एक वस्तु में सिमट कर रह गई है। कोई भी क्षेत्र हो, अध्ययन में, राजनीति में, मरने में जीने में कभी एक व्यक्ति को उसकी बुद्धिमता से नहीं आंका गया। मेरा जन्म मेरे लिए एक घातक हादसा है... मैं अतीत का एक शुद्र बच्चा... ये ऐसे सवाल हैं जिन्हें आवाज देने की कीमत रोहित ने अपनी जान से चुकाई है, लेकिन ये एक मामला है ऐसे कितने रोहित और कितने मामले हैं जिनमें अन्याय और भेद का आधार जन्म है।
बेशक ये कहा जाता हो कि ऊंचे आर्थिक या बौद्धिक वर्ग में प्रवेश करते ही समाज उदार हो जाता है और उसकी वर्जनाएं शिथिल हो जाती है, मगर ये आभासी लगता है। जब मध्यप्रदेश में हाल ही में आंदोलित हुए दलित समुदाय के दो आईएएस रमेश थेटे और शशि कर्णावत की व्यथा भी रोहित जैसी लगती है। मूल रूप से उनकी भी शिकायत यही है कि कोई ऐसा फोरम नहीं है,जहां तसल्लीबख्श और त्वरित सुनवाई हो। थेटे का कहना उन्हें चिन्हित कर ऐसे आरोपों में खींचा जा रहा है, जिसमें अन्य समुदाय के आरोपियों को नजरअंदाज कर दिया गया है, कुछ ऐसा ही आरोप शशि कर्णावत का भी है। सेवानिवृति के चंद घंटों पहले अपने घर पर विभागीय जांच का नोटिस चस्पा होने का रंज झेलने वाले वरिष्ठ आईएएस के सुरेश भी दलित समुदाय से थे, जिन्हें नियमों की रोशनी में उन्हें पदोन्नित दी जा सकती थी मगर मिली नोटिस की सूचना। समाज की मुख्यधारा में दलित बहुत ऊंचे मकामों तक भी पहुंचे हैं... यहां भेद न होने और कम होने का आभास-आंकलन भी है। इनमें समूह की पहचान से बाहर रहने और सामान्य होने के दबाव से ऐसा वर्ग बन गया है जो बड़े सवालों पर भी मौन है। असंगठित होने के कारण शेष लोग और उनके छोटे-मोटे संगठन अपनी जरूरतों में उलझे रहते हैं। ऐसे में सुनवाई की सटीक व्यवस्था लगातार टलते फैसले जैसी हो गई है जिसमें आज के प्रावधान अंतरिम व्यवस्था लगते हैं, औपचारिक सुनवाई से प्यास बुझने की बजाए ‘औकात’ पता चलती है। अगर उचित व्यवस्था हो तो ऐसे सवालों का वक्त रहते जवाब खोजा जा सकता है,मगर दलित सवाल तो अब हाशिए से भी बाहर खिसकने लगे हैं। जिनकी अनसुनी बड़ी गूंज बन सकती है।

Tuesday, September 21, 2010

ख्वाब और खुदा...

दिन भर ख्वाब बुनता हूं
रात भर जागता रहता हूं

मंजिलें दौड़ती रहती हैं
मैं भी भागता रहता हूं

न जाने कब मिले मौका
अब भी ताकता रहता हूं

फस्ले ईमां बोई थी मैंने
दुख ही काटता रहता हूं

खुदा अब खुद ही चले आना
मैं खिड़की से झांकता रहता हूं

Tuesday, September 7, 2010

तो कौन जिम्मेदार होता....

भोपाल में सोमवार को भाजपाई आयोजन ने ट्रैफिक व्यवस्था को ध्वस्त कर दिया और शहर भर परेशान ... ऐसे में सवाल यह है कि जब तय था कि इतने लोग और गाड़ियां आएंगी तो पुलिस के बड़े अधिकारियों और भाजपा के काडर लीडरों ने कोई व्यवस्था क्यों नहीं की... क्या इसके लिए दोषी नहीं कहना चाहिए... इस भीड़भाड़ में बाबरी फैसले और आतंकी टारगेट ...के चलते संवेदनशील भोपाल में कुछ हो जाता तो कौन जिम्मेदार होता....

Friday, September 3, 2010

आतंक के रंग से राजनीति के कैनवास पर कलाकारी....

एक साहब हैं, पद और कद देश की अस्मिता और आतंरिक शांति के लिहाज से सबसे महत्वपूर्ण, नाम है पी चिदम्बरम... उन्होंने आतंक में आस्थाओं से जुड़ा एक रंग खोजा और पार्टी पदाधिकारी या मंत्री नहीं वरन् औसत बुद्धी से नीचे के व्यक्ति की तरह रेंक पड़े यह तो भगवा है... उनसे ज्यादा महान वे निकले जो विरोध में उठ खड़े हुए... उन्हें यह हमला सारे धर्म पर नजर आया.... लगे चिल्लाने अरे लोगों देखो ये हमें गाली दे रहा है आओ राम के नाम पर छले थे तो क्या अब भगवा पर एकजुटहो जाओ.... बहुत साल हो गए हैं सत्ता सुंदरी रूठी है तुम मान जाओ तो वह भी मान जाएगी... वरना सोनिया तो फिर अध्यक्ष बन ही गई हैं.... ऐसा ही रहा तो राहुल भी प्रधानमंत्री हो जाएगा और हमारा वनवास और लंबा हो जाएगा.... आगे पता नहीं क्या हो।
दरअसल कई सवाल शेष हैं कि यह प्रतिआतंक कहां से आया और इसके पोषण के पीछे कौन है और क्यों हैं... लेकिन इसके बहाने समाज का धुव्रीकरण करने वाले जाने पहचाने हैं और उनकी नीति नियत भी साफ दिख रही हैं। कांग्रेस-भाजपा दोनों अपने-अपने वोट बैंक बनाएगी और अपने ही लोगों को एक दूसरे से डराएगी.... यानी खेल साफ है इंतजार रहेगा सिर्फ स्कोर का... बगैर यह सोचे कि इससे देश में विघटन की लहर उठी तो उसके सैलाब में क्या-क्या आ जाएगा। वैसे लोगों को पता होना चाहिए कि भगवा कोई धर्म नहीं बलि्क सनातन धर्म की जीवनशैली का अहम हिस्सा है पूरा का पूरा धर्म नहीं इसलिए हो सके तो इस शब्द का इस्तेमाल करने वालों और विरोध करने वालों दोनों से बच कर रहना क्योंकि ये पहले देश को उकसाएंगे, दंगे कराएंगे फिर घरों को जलाएंगे और उसी आग पर अपनी राजनीति की रोटी पकाएंगे।

Saturday, August 14, 2010

ये आजादी है या गुलामी... सवाल है वल्दियत...

जन्मभूमि जननी और स्वर्ग से महान है। मेरा देश- मेरी धरती मेरी मां है... फिर राष्ट्रपिता और राष्ट्रपति जैसे शब्दों का क्या मायना है? अगर मां कहलाने वाली हमारी मातृभूमि का अस्तित्व प्राकृतिक, भौगोलिक और सामाजिक-सांस्कृतिक रूप से युगों से कायम है तो क्या हर पांच साल में नया पति (राष्ट्रपति) और कथाकथित आजादी के बाद पिता (राष्ट्रपिता) का क्या औचित्य और इसकी क्या जरूरत... वह भी उस स्थिति में जब प्रेसीडेंट के अनुवाद में राष्ट्राध्यक्ष और आधुनिक भारत के संदर्भ में आधुनिक राष्ट्र के मूलाधार, कर्णधार, शिल्पकार जैसे शब्द मौजूद हैं...

Monday, February 1, 2010

मुंबई की आड में महंगाई पर समर्पण, राष्ट्र से ऊपर महाराष्ट्र

पहली फरवरी 2010 यानी सोमवार बयानों के नाम रहा। अगर गौर से देखा जाए और एक साथ आए बयानों को साथ रख कर देखें तो साफ हो जाएगा कि राजनीति की नूरा कुश्ती में कैसे आम आदमी के हितों से खिलवाड़ किया जा सकता है। महंगाई बनाम मुंबई में कुछ यूं बयान आए कि महंगाई गौण और महाराष्ट्र का मुद्दा महान हो.. इस कुछ न किया गया तो न जाने क्या हो जाएगा। ठाकरे परिवार की राजनीति बिसात सारे राष्ट्र के हित से बड़ी प्राथमिकता हो गई, गोया सरकार ने आज कुछ नहीं किया तो चार चिरकुटों की फौज वाले ये गुंड़ो का गिरोह मुंबई पर कब्जा कर सबको बाहर फेंक देगा... देश का हिस्सा न हुआ भिखारियों के हाथ में फंसी रोटी हो गई जिसे जो चाहेगा लूट लेगा। दरअसल इस विषय पर बात से पहले जरूरी हैं कि इस विषय पर सोमवार को आए बयानों को समझ लिया जाए।

प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने सोमवार को साफ कर दिया सरकार के पास न तो खाद्य वस्तुओं की पर्याप्त उपलब्धता है और न ही वे महंगाई को नियंत्रित करने में सक्षम हैं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने राज्यों के मुख्य सचिवों की बैठक में कहा कि पिछले कुछ समय से, यह गलत धारणा रही है कि खाद्य वस्तुओं की उपलब्धता पर्याप्त है और चिंता जैसी कोई बात नहीं है। इसी प्रकार, कई लोगों का मानना था कि हम कीमतों को नियंत्रित करने में सक्षम हैं। लेकिन बढ़ती जनसंख्या और लोगों के उच्च जीवन स्तर को देखते हुए खाद्य वस्तुओं की आपूर्ति बढ़ाने की जरूरत है। गौरतलब है कि जिस वक्त यह बयान आया तभी चीनी, तेल, दूध, चावल आदि के दाम और बढऩे की बात हो रही है। यानी कुछ हो गया तो फिर न कहना...

उधर बाल ठाकरे और राज ठाकरे की मुंबइया मनमानी पर कान में उंगली डाले बैठी केंद्र सरकार को आखिर सोमवार को यह हंगामा सुनाई दिया और गृह मंत्री ने सख्त रुख अपनाते हुए ऐलान किया कि मुंबई में सभी भारतीयों की है और सभी यहां रहने और काम करने के लिए स्वतंत्रत हैं। शिव सेना की ''मुंबई मराठियों कीÓÓ दलील को घातक सिद्धांत बताते हुए चिदम्बरम ने कहा कि हम शिव सेना के मत को खारिज करते हैं। मुंबई पूरे भारत की है और सभी भारतीय मुंबई में रहने और रोजी कमाने के लिए स्वतंत्र हैं। चिदंबरम ने कहा कि महाराष्ट्र सरकार किसी भी स्थिति से निपटने में सक्षम है और अगर उसे किसी मदद की जरूरत हुई तो केन्द्र उपलब्ध कराएगा।

इसी दिन अचानक राहुल गांधी भी जो भोपाल में कह चुके थे कि सरकार महंगाई नियंत्रण जल्द कर लेगी वह भी बोल पड़े कि मुंबई सबकी है। इतनी ही नहीं वह एक कदम आगे बढ़ कर बोले कि मुंबई को आतंक से निजात दिलाने वाले एनएसजी कमांडो बिहार यूपी के थे। हालांकि उन्होंने यह सोर्स नहीं बताया कि उन्हें कैसे पता चला कि उस फोर्स में कहां के लोग थे, क्योंकि सामान्यत: यह गुप्त रहता है कि ऐसे मिशन में कौन से कमांडो शामिल थे और उनकी पहचान क्या है।

राष्ट्रीय स्वयं सेवा संघ द्वारा महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों को सुरक्षा देने की बात कहने पर भाजपा ने भी संघ के सुर में सुर मिला दिया। रविवार को इस मुद्दे पर भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने कहा था कि वे पहले संघ प्रमुख से बात करेंगे। लेकिन सोमवार को उन्होंने खुलकर कहार कि उत्तर भारतीयों को सुरक्षा देने संबंधी संघ के मत से सहमत हैं। गडकरी ने कहा कि देश के सभी क्षेत्रों के भारतीयों को भारतीय सीमा के भीतर कहीं भी रहने का अधिकार है।



महंगाई बनाम मुंबई मामले को लेकर चंद सवाल हैं जिनके जवाब खोजने जरूरी हैं।

1 महंगाई पर बहलाती रही सरकार को अचानक सोमवार को क्या हो गया कि उसने यूं आनन-फानन हाथ खड़े कर दिए। क्या आम और गरीब आदमी को कीमतों की चक्की में पीसने का इरादा है या पूंजी तंत्र के हाथों देश के बिक जाने की अनाधिकृत घोषणा की गई है।


2 क्या हमारी व्यवस्था और कानून वाकई इतने लाचार हैं कि आम आदमी की जीवन रक्षक खाद्य वस्तुओं के दाम नियंत्रित नहीं किए जा सकते। या बाजार तंत्र का दबाव नियंत्रण से बाहर हो गया है। साथ ही देश को आपदा युद्ध, प्राकृतिक या आर्थिक आदि से बचाने का सिस्टम नष्ट कर दिया गया है।


3 क्या मुंबई मामले पर ठाकरे परिवार और उनके समर्थकों पर नकेल नहीं डाली जा सकती। क्या वहां कानून उनकी बांदी है? या सरकार खुद इस मुद्दे को किसी बड़े इश्यू को दबाने के लिए बढऩे दे रही थी, ताकि सही समय पर उसका उपयोग किया जा सके।







Monday, January 25, 2010

बिन भाषा के गूंगे-बहरे राष्ट्र में काहे का गणतंत्र



गणतंत्र दिवस की पूर्वसंध्या पर गुजरात हाईकोर्ट का राष्ट्रभाषा के संदर्भ में एक जनहित याचिका पर जो फैसला आया, उसमें नियमों और कानूनों से बंधी कोर्ट की बेबसी तड़पा देने वाली है। डिब्बाबंद सामग्री पर हिंदी में निर्देश न छपवा पाने के फैसले का आधार बना हिंदी का राष्ट्रभाषा न होना... कोर्ट ने कहा हिंदी को राजभाषा का दर्जा तो दिया गया है, लेकिन क्या इसे राष्ट्रभाषा घोषित करने वाला कोई नोटिफिकेशन मौजूद है? अनुपयोगी जनसंख्या के सिलसिले में यह विषयांतर सा लगता हुआ ब्लाग समय से पहले स्वत: इसलिए भी जुड़ गया है, क्योंकि यह मुद्दा भी देश की उन्नति-प्रगति से जुड़ा है।
बहरहाल ब्लागिया टिप्पणी से पहले आप मामला समझ लें कि पिछले साल सुरेश कचाडिय़ा ने गुजरात हाई कोर्ट में पीआईएल दायर करते हुए मांग की थी सामानों पर हिन्दी में डीटेल लिखे होने चाहिए और यह नियम केंद्र और राज्य सरकार द्वारा लागू करवाए जाने चाहिए। वहीं पीआईएल में कहा गया था कि डिब्बाबंद सामान पर कीमत आदि जैसी जरूरी जानकारियां हिन्दी में भी लिखी होनी चाहिए। जिसके तर्क में कहा गया कि चूंकि हिन्दी इस देश की राष्ट्रभाषा है और देश के अधिकांश लोगों द्वारा समझी जाती है इसलिए यह जानकारी हिन्दी में छपी होनी चाहिए। इस पर चीफ जस्टिस एसजे मुखोपाध्याय की बेंच ने यह कहा कि क्या इस तरह का कोई नोटिफिकेशन है कि हिन्दी भारत की राष्ट्रभाषा है क्योंकि हिन्दी तो अब तक राज भाषा यानी ऑफिशल भर है। अदालत ने पीआईएल पर फैसला देते हुए कहा कि निर्माताओं को यह अधिकार है कि वह इंग्लिश में डीटेल अपने सामान पर दें और हिन्दी में न दें। अदालत का यह भी कहना था कि वह केंद्र और राज्य सरकार या सामान निर्माताओं को ऐसा कोई आदेश जारी नहीं कर सकती है।

कोर्ट का यह फैसला भारत यानी ऐसे देश (राष्ट्र नहीं ) में आया है, जिसमें राष्ट्रभाषा का प्रावधान संविधान में ही नहीं है, यहां उपलब्ध है तो केवल राजभाषा... यानी सरकारी काम की भाषा। यह स्थिति उस हाल में है जब देश की लगभग 60 फीसदी आबादी यानी करीब 65 करोड़ लोग इस भाषा का इस्तेमाल कई बोलियों के साथ करते हैं। अब सवाल यह है कि इनमें से कितने लोग होंगे जो संपर्क भाषा यानी अंग्रेजी नहीं जानते होंगे। जनसंख्यागत और शैक्षणिक आंकड़ों को देखा जाए तो इनमें से ठीक से अंग्रेजी में काम करने वालों का प्रतिशत बमुश्किल 10 से 15 फीसदी निकल पाएगा। यानी दवा के लेबलों से लेकर कानून, शिक्षा और कारपोरेट उत्पादों की बेढंगी दुकानों के उत्पाद और उनकी टर्म एंड कंडीशन इनकी समझ से बाहर होंगी। ऐसे लोगों की संख्या होगी करीब 55 करोड़ यानी लगभग आधा देश। शेष बचे लोगों के हालात क्षेत्रीय भाषा के बाद संपर्क भाषा में कैसे होंगे इस पर तर्क-वितर्क की गुंजाइश है, लेकिन हालात नहीं बदलेंगे। अब गणतंत्र दिवस पर भारत को राष्ट्र कहने का दंभ भरने वाले नेता और अकल बेचने वाले व्यक्ति-संस्थान देखें कि क्या कारण रहा कि गणतंत्र यानी लोगों का, लोगों द्वारा और लोगों के लिए कहलाने वाला सिस्टम लागू होने के साठ साल बीतने पर इंडिया (हिंदुस्तान नहीं) के पास आधिकारिक रूप से राष्ट्रभाषा नहीं है, यानी आधी आबादी को भाषा के लकवे से विकलांग कर पढ़े-लिखे जाहिलों के बीच अपनी सत्ता की दुकानें आराम से चलाते रहें। क्या कोई एक नेता यह बताने में सक्षम है कि बहुमत का जमाना कहने वाला सिस्टम देश के इतने बड़े तबके की अनदेखी क्यों कर रहा है, जबकि सूरते हाल यह है कि लगभग पूरे देश में हिंदी-बोली समझी जाती है। यहां क्षेत्रीय भाषाएं भी हैं, लेकिन वहां भी कुछ एक दूरस्थ और पूर्वाग्रह से ग्रसित दक्षिणी हिस्सों को छोड़ कर शायद ही कहीं हिंदी की स्वीकार्यता में कमी हो।

वोटबैंक के लिए अंतरराष्ट्रीय अंग्रेजी भाषातंत्र व देश में क्षेत्रीय भाषाओं की ओट लेने वाले नेता और ज्ञान-विज्ञान के नाम पर अंग्रेजी की दुहाई देने वाले लोग, इन पचास करोड़ से ज्यादा ज्ञान वंचित हिंदी भाषियों के लिए क्या करेंगे? क्या वे राष्ट्र गौरव के नाम पर हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिला कर चीन, जर्मनी, रूस और जापान की राह पर जाकर सफलता के नए अध्याय लिखेंगे या मानसिक गुलाम नेताओं से पाई बेडिय़ों से आने वाली नस्लों को जकड़े रहेंगे। देश के सर्वोच्च जनप्रतिनिधित्व मंदिर संसद और सुप्रीम कोर्ट में अगर हिंदी को बेहतर जगह मिले तो मातृभाषा में सोचने वालों की इतनी बड़ी संख्या राष्ट्र को नवनिर्माण पथ पर कहां ले जाएगी... अनुमान लगना बेशक कठिन हो पर सोच कर जरूर देखना।

Saturday, January 23, 2010

जाति और शिक्षा की जंग में हैं जीत के बीज



माफ करना मेरी यह पोस्ट राहुल गांधी के सिलसिले में जारी चर्चा के बीच सुरेश चिपलूनकर के पुराने ब्लाग का जवाब बन कर भी नजर आएगी और कई तथ्य वहां आप को जस ते तस भी मिल सकते हैं दरअसल अनुपयोगी जनसंख्या के सिलसिले में आम विचारों को खोजता हुआ मैं वहां पहुंच गया था और सिलसिले से सिलसिला मिल गया। दर हकीकत राहुल तो निमित्त नजर आते हैं, दरअसल संस्कारों की घुट्टी में मिली सामंती सोच ने देश की प्रगति को जकड़ कर रखा है, जिसका नाता न केवल देश की अनुपयोगी (शैक्षिक जनसंख्या से है ) बल्कि विकास से भी है। शायद इसिलिए सुरेश चिपलूनकर जैसे तथाकथित विचारवान लोग भी इसकी चपेट में आने से नहीं बच सके हैं। ( संदर्भ सरेश चिपलूनकर का ब्लाग आरक्षण आक थू)


देश को ताजा नेतृत्व की जरूरत है, क्योंकि देश की प्रगति के सवाल का जवाब हैं नीचे लिखे सवालों जैसे कई सवाल जो सोते हुए लोगों को जगाने के लिए पर्याप्त हैं।

1 भारत की कितनी आबादी अनुपयोगी है (शैक्षिक लिहाज से)

2 इस अनुपयोगी आबादी में कितने फीसदी लोग आरक्षण श्रेणी में आने वाले तबके के हैं।

3 इन अनुपयोगी लोगों में कितनी महिलाएं हैं।

4 आरक्षित आबादी के कितने लोगों को आरक्षण का लाभ मिला है और किस श्रेणी पर

5 भारत की सर्वोच्च सिविल सेवाओं के शीर्षस्थ पदों पर कितने फीसदी लोग आरक्षण से पहुंचे हैं। तीसरे और चौथे दर्जे पर पहुंचने वालों को आधार न बनाएं तो बेहतर।

6 देश की किसी भी तरह की शीर्षस्थ संस्थाओं में उच्च पदों पर जातिगत समीकरण क्या है, इसमें आप अपनी सुविधा के लिए डिब्बाबंद सुअर मांस बेचने वालों से लेकर सरकार तक सभी को शामिल कर सकते हैं।



तर्कसम्मत ढंग से सोचना कि हमारी बढ़ती आबादी आग क्यों बन रही है ऊर्जा क्यों नहीं। फिर भी कहीं कसर बच जाए तो इन बिंदुओं का ध्यान करना बात बन जाएगी।



1 जापान किस चीज के दम पर दुनिया में अपनी हस्ती बनाए हुए है?

2 इजराइल की अस्मिता का राज क्या है?

3 आबादी में आगे चीन इतना ताकतवर कैसे हो गया?



1947 से अब तक अगर शैक्षिक व सरकारी तंत्र में वास्तविक रूप से आरक्षण प्रभावी होता तो देश में साक्षरता सौ फीसदी तक पहुंच गई होती और आज हालात ये हैं कि भारतीय मस्तिष्क जिसका लोहा दुनिया मानती है, उसके दो तिहाई युवा निरक्षर हैं (इसका स्रोत संयुक्त राष्ट्र की रपट है), सोचो अगर ये सब काबिल होते तो क्या केवल आरक्षित-अनारक्षित नौकरियों के लिए रेस लगाते या रोजगार के नए क्षेत्रों और आयामों का सजृन करते हुए दुनिया की जरूरत बन जाते। अगर वैसे कुछ होता तो तकनीक या अन्य तरह के विविध ज्ञान के अस्त्रों से लैस यह युवा आज देश को किस स्थिति में पहुंचा चुके होते।

देश के विचारवान लोगों की भीड़ जो सामंती सोच के गुंड़ों के गिरोह में तब्दील हो कर विघटन में जुट गई है उसे अगर जोर लगाना है और वह वाकई देश का भला चाहती है तो हजारों साल से उच्च वर्ग के सताए हुए वर्ग पर टिप्पणियां छोड़ कर यह सोचे कि अगर यह वर्ग भी किसी तरह से शिक्षित हो कर मुख्यधारा में शामिल हो गया तो हिंदु सामाजिक संस्तरण भले ही बराबरी पर आ जाए लेकिन देश कहां से कहां पहुंचेगा। संसद में देश का प्रतिनिधित्व करने वालों को गरियाने से बेहतर होगा कि यह सोचें कि देश के युवाओं को किसी नई दिशा में जाना चाहिए न कि ठहरे हुए पानी की कम पड़ती मछलियों (नौकरियां और शैक्षणिक संस्थाओं पर आरक्षण) पर हक जमाने के लिए जातिवाद और नस्लवाद को भड़काएं।

Thursday, January 21, 2010

राहुल रंग भरो कैनवास तुम्हारे सामने है




राहुल गांधी को परिस्थितियों, तकदीर और उनकी मेहनत ने ऐसी स्थिति में ला खड़ा किया है कि वे और उनकी ब्रिगेड देश को नई दिशा की ओर ले जा सकती है और अगर सत्ता सुंदरी ने मोह लिया तो फिर वही होगा जो पिछले कई सालों से सियासत में जारी है.... पिछली पोस्ट में मैने कहा था कि देश की सबसे बड़ी समस्या है अनुपयोगी जनसंख्या जो देश को दावानल की तरह लील रही है। मेरा अभिप्राय अनुपयोगी से क्या है इसे स्पष्ट करने में जगह और जोर दोनों जरूरी हैं. इसलिए इस क्रम की पहली कड़ी के रूप में जान लिजिए कि केवल शैक्षिक लिहाज से देश किस दिशा में जा रहा है। इस काम में मैने लफ्फाजी की बजाए संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट को आधार बनाया है। रिपोर्ट के चुनिंदा अंश पेश हैं। यह आंकड़े और इससे जुड़े तथ्य देश को कैसे प्रभावित कर रहे हैं और क्या संभावनाएं हैं यह सभी कुछ आगे के अंकों में आपको पढऩे को मिलेगा।




भारत में अभी भी बड़ी आबादी है निरक्षर : यूनेस्को



शिक्षा के क्षेत्र में संयुक्त राष्ट्र ने अपनी ताजा रिपोर्ट में कहा है कि दुनिया में भारत में अभी भी बड़ी आबादी निरक्षर है। 'दी एजुकेशन फोर आल : ग्लोबल मोनिटरिंग रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया में 79 करोड़ 90 लाख निरक्षर वयस्कों में से भारत में इनकी संख्या सर्वाधिक है। यूनेस्को की रिपोर्ट कहती है कि जिन सात करोड़ 20 लाख बच्चों को प्राथमिक स्कूल में और जिन सात करोड़ दस लाख किशोरों को माध्यमिक स्कूलों में होना चाहिए था वे वहां नहीं हैं और यदि यही चलन जारी रहा तो वर्ष 2015 तक पांच करोड़ 60 लाख बच्चे प्राथमिक स्कूलों से बाहर होंगे।
यूनेस्को की रिपोर्ट में कहा गया है कि 1985 से 1994 के बीच देश में करीब आधी वयस्क आबादी निरक्षर थी। चूंकि वयस्क आबादी में 45 फीसदी का इजाफा हुआ है, इसलिए अब यह संख्या दो तिहाई हो गई है।
रिपोर्ट में लैंगिक असमानता पर भी रोशनी डाली गई है जहां 28 विकासशील देशों में स्कूलों में दस लड़कों के पीछे नौ या उससे कम लड़कियां हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि कुल निरक्षर आबादी में दो तिहाई संख्या महिलाओं की है।
शिक्षा के लिए संयुक्त राष्ट्र की इकाई की कार्यकारी निदेशक बोकोवा ने कल संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में रिपोर्ट जारी करते हुए कहा कि कम शब्दों में कहें तो यह एक भ्रमित पीढ़ी को पैदा करेगा जो समाज के लिए भारी क्षति है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कम आय वाले देशों में शिक्षा की गुणवत्ता बेहद खराब है और दक्षिण एशिया में जाति प्रथा शिक्षा में बाधा पहुंचा रही है। ग्रामीण भारत में तीसरी कक्षा के मात्र 28 फीसदी बच्चे दो अंकों की जमा घटा कर सकते हैं और तीन में से केवल एक बच्चा घड़ी में देखकर समय बचा सकता है। रिपोर्ट कहती है कि भारत के ग्रामीण इलाकों में वोकेशनल कार्यक्रमों तक केवल तीन फीसदी युवकों की पहुंच है और इस बात के बहुत कम संकेत मिलते हैं कि इससे युवकों को रोजगार पाने में किसी प्रकार का लाभ हो रहा है।
इस पूरे सिलसिले में सबसे महत्वपूर्ण पहलू जो उभरे हैं वह हैं, युवा, बच्चे, लैंगिक आधार पर शिक्षा में खाई और जाति व्यवस्था। इन विषयों विचार करें तो लगेगा अभी तो काम शुरू भी नहीं हुआ है।

Wednesday, January 20, 2010

राहुल रोशनी न बुझे, अगर जलाएं हैं चराग उम्मीदों के...

राहुल गांधी मध्यप्रदेश आए, छात्रों से मिले, राजनीति में आने का न्योता दिया, साफगोई से कड़वे आरोपों को स्वीकार किया... बहुत बरसों बाद राजनीति की गहरी गंदली काई छंटती सी महसूस हुई। लेकिन बधाई पाने के लिए अभी इंतजार करें। बहुत सवाल बाकी हैं नियती, नीति और नियत का आइना अभी धुंधला है, अगर ये साफ हो कर सच बोलने लगे तो बात बनेगी।
पता नहीं राहुल ब्रिगेड ने इस पर मंथन किया है या नहीं कि लाल बहादुर शास्त्री के बाद वाले राजनीतिक परिदृश्य में नेताओं की स्वीकार्यता क्यों कम होती चली गई और लोग (खासकर अच्छे लोग) पहल करने, सामने आने और साथ देने तक में कतराने लगे हैं, नई पीढ़ी इस घुट्टी के साथ टारगेट हिट करने में जुटी है कि जहां से जैसे भी जो भी लाभ मिले ले लो और आगे बढ़ो, देश और समाज को रिटर्न देने की चिंता गई तेल लेने... क्योंकि इसके नाम पर खून चूसने वाला सिस्टम और राजनीति की रोटी सेंकने वालों की दुकाने कदम-कदम पर सजी हैं। देश के शीर्ष राजनीतिक प्रतिनिधियों का मेकअप स्टिंग आपरेशनों से लेकर संसद के गलियारों में बेलगाम बयानों और कोर्ट की कार्रवाइयों तक में लगातार उतरता जा रहा है और जो बचा-खुचा नजर आ रहा है, लगता नहीं है कि कोई उसे प्रेम करने की हिम्मत करेगा। हां अपनी जरूरतों को निकालने के लिए फालोअर मिल जाएं या दीवाने जुट जाएं ये बात जुदा है।
इस सूरते हाल में राहुल अगर घर (संगठन) संवारने की राह पर निकलें हैं तो अच्छा है क्योंकि नीति और नियत पाकीजा हुए तो फिर उम्मीदों के चिरागों की रोशनी कहां तक पहुंचेगी यह दुनिया बताएगी। राहुल मध्यप्रदेश प्रवास में संगठन के आंतरिक लोकतंत्र और युवा पीढ़ी को कांग्रेस से जोडऩे पर फोकस नजर आए, लेकिन सवाल ये है कि जिस दिशा में जिस अंदाज में राहुल गांधी आगे बढ़ रहे हैं वह कैसे और कितने फल देगा और उसका लाभ वितरण कैसे होगा। दूसरा पहलू यह है कि क्या यह सिर्फ अगले चुनाव के लिए सेना जोडऩा और उसे दुरुस्त और चाक-चौबंद करना है या नियत में इससे आगे का भी कुछ और ऐजेंडा छिपा है। अगर है तो अच्छा है वरना समझ लो कि यह मौका है जैसे राजीव गांधी ने देश को तकनीक, सूचना-प्रोद्योगिकी क्रांति का स्वाद चखाया था, वैसे ही यह देश अपनी सबसे दुखती रग अनुपयोगी जनसंख्या को सबसे मजबूत पक्ष के रूप में ढाल सकता है। जरूरत है केवल दृढ़ संकल्प वाले सच्चे लीडर की, उसे साथी तो मिल ही जाएंगे।
बहुत संक्षेप में अपनी बात कहने की कोशिश की है, इस मैसेज को कवर पेज की तरह देखें तो ज्यादा अच्छा होगा, अगर कोई सुपात्र चाहेगा तो इसके डिटेल बताने वाले इंडेक्स भी इसी पते पर प्रकाशित किए जाएंगे और अगर पसंद आने पर यह बात आगे बढ़ी तो आंकड़ों के साथ इस विषय पर क्रमवार बहुत सारे पेज इसे पूरी मेग्जीन की शक्ल दे देंगे।

Saturday, August 29, 2009

सरमद याद आया


अमेरिका के लास एंजिलस में गो टापलेस आंदोलन के चलते जब महिलाएं अनावृत स्तनों के साथ सड़कों पर आई एक बार फिर ये सवाल दुनियाभर में पहुंच गया है कि जब पुरुष टापलेस हो सकते हैं तो महिलाएं क्यों नहीं। आखिर प्रकृति से एकाकार होने का हक उन्हे क्यों न मिले... इन्हें दो मनुष्यों के बीच लिंग विविधता की दीवार और स्त्री पर अधिकार की जंजीर क्यों बनाया जाए। हम में से शायद ही कोई स्त्री होगी जिसने सीना अनावृत न कर पाने की बंदिशों के कारण कोई पीड़ा न उठाई हो। चाहे वह अपने नवजात को स्तनपान करने के वक्त की हो या तपती गरमी में बंद कमरे में पसीने से भीगने की... यौन भेद की इन दीवारों के औचित्य और गैरजरूरी होने पर काफी बहस की गुंजाइश है, मगर यह तय है कि सूरत तो बदलना चाहिए। इसी सिलिसले में दिल्ली के मस्तमौला फकीर सरमद का अक्स जहन में उभर आया है। उसे बादशाह औरंगजेब ने इसिलए मरवा दिया था, क्योकि वह आधा कलमा पढ़ता था और न तो किसी को पूज्य मानता था न ही कपड़ों की जरूरत महसूस करता था। कहते हैं जब उससे पूछा गया कि नंगा क्यों है तो उसने कहा मालिक (परमात्मा) ने गुनाहगारों को गुनाह छिपाने के लिए ये कपड़े और दूसरे परदे दिए हैं, मेरे और परमात्मा के बीच अब कोई परदा नहीं क्योंकि मैं सारे गुनाहों से मुक्त हूं। इसलिए कपड़ों की जरूरत क्या है। बस यही बात उसकी मौत का कारण बनी। स्त्रीयों के अनावृत स्तन को पापमुक्त मानने-देखने की ताकत व समझ दुनिया के कौने-कौने तक कब तक पहुंचेगी नहीं जानता, लेकिन यह तय है कि प्रकृति कभी फैशन बन कर तो कभी आंदोलन बन कर और कभी पोर्न इंडस्ट्री बन कर पुरुषवाद और महिलाओं को एकाधिकार वाली यौन दासियों में तब्दील करने वाली दीवारों में सुराख बनाती रहेगी।

Saturday, February 14, 2009

पब, पिंक चड्ढी और इतनी हाट ऐश- हर हाथ में दुखती रग


श्रीराम सेना ने पब में लडकियों को पीटा (आदमियों को क्यों छोड दिया?), निशा सूसन एंड पार्टी ने पिंक चड्ढी की धूम मचाई, शायद इसके अलावा विरोध का कोई जरिया नजर ही नहीं आया होगा, आखिर प्रगतिशीलता भी तो कोई चीज है। इस क्रम की बचीखुची कसर ऐन वैलेंटाइन डे पर बर्लिन में पिंक पैंथर पार्टी में एश्वर्या की हार्टशेप सेक्सी टापलेस ड्रेस ने पूरी कर दी। इससे माडर्न, एडवांस और ग्लोबल सोच वाली यूथ (बुढाती उमर में खुद को जवां दिखाने की अंतिम कोशिश एक्सपोजर पर मजबूर) आइकन और ख्यात बच्चन घराने की बहू ( जिसमें कई लोग अपनी बहू की छवि ढूंढते हैं) भला और कहां होगी... पर क्या करेगा काजी जब मियां बीबी राजी
असल में सब के सब अपने आप को मार्केट करने के लिए कंसेप्ट बेच रहे हैं, निशाना है अलग-अलग क्लास और कैटेगिरी के लोग। कई बार तो लोगों को ये चाले नजर ही नहीं आती और कुछ को आती भी है तो वे बहती गंगा में हाथ के साथ नहा-धो लेने में विश्वास करते हैं। चाहे श्री राम सेना का मुतालिक हो या सूसन सबको चाहिए इमोशनल सपोर्ट क्रिएट करने वाला ऐसा फंडा जो बिना एड और एक्सपेंडेचर के उन्हें ब्रांड बना दे, जिससे ये वक्ती नायक बाद में अपनी दुकानें चलाते रहें। मुतालिक ने पहले पब में हंगामा मचाया और बाद में वेलेंटाइन डे प्रोग्राम घोषित कर दिया, बस फिर क्या था, सज गई दुकान... गृहमंत्री का बयान और विरोध शबाब पर आ गया कल जिसे कोई जानता तक नहीं था नेशनल फीगर हो गया... अकल के अजीर्ण वाले बयानवीर ब्लागरों से ले कर फुरसती धंधेबाजों को काम मिल गया... कुछ कमअकल लोग बेकार में ही अब्दुल्ला दीवाना बन कर लगे नाचने....
खैर उनका तो काम हो गया अब चैप्टर नंबर दो शुरू होना था विरोध का... इसके लिए कुछ तय दुकानों की मोनोपाली है उनके बयान-बयान और स्ट्रेटेजी घोषित हो ही रही थी कि निशा सूसन के दिमाग के न्यूज एनालिसिस सेंसे ने सेक्स भडकाऊ, दिल धडकाऊ और बत्ती बुझाऊ टाइप का आइडिया उगल मारा और पुरानी दुकानों का दिवाला पिटने के साथ ही शुरू हो गया पिंक चड्ढी कैंपेन... अब यहां भी निठल्ले ज्ञानियों को कर्तव्य विद् लाइम लाइट एक्सपोजर का बोध हो गया और सौ पचास रुपए की चड्ढी की कीमत पर फेमेनिस्टि और एडवांस होने की डिग्री बंटने लगी। दुकान तो ऐसे सजाई गई गोया चड्ढी नहीं संपूर्ण स्त्रीत्व को पैक करके मुंह पर मार दिया गया है। चड्ढी भेजने के आइडिए के मायने सूसन बेहतर जाने पर किसी भी आम लडकी या औरत से पूछ कर देखें कि उसकी चड्ढी के मायने क्या हैं चाहे वह दुनिया के किसी भी हिस्से में रहती हो। उधर चड्ढी के बाजार में सेंध लगाने के लिए लगे हाथ कुछ भाइयों ने कंडोम का तडका लगाया, थोडी बहुत हलचल भी मची, लेकिन तब तक हमें क्या करना की खुमारी खेल बिगड ही रही थी कि मारल पुलिसिंग का महोत्सव वैलेंटाइन डे आ गया... देश भर में महान समाज सेवक निकल पडे लोगों को मोहब्बत और नैतिकता का पाठ पढाने...
इस मौके का फायदा उठाने की सबसे अलग कोशिश की ऐश्वर्या राय ने... हाथ से नक्षत्र समेत लगातार निकलते एड, पिटती फिल्में, घटती टीआरपी और जलवे के बुझते दीपक के बीच पिंक पैंथर की उम्मीद पर आलोचकों ने ढीला रिस्पांस और थकी फिल्म की मुहर लगा दी। तो... अब क्या करें, कैसे बताए कि रूप का जादू वही है जो मिस वर्ल्ड और उन दिनों के न्यूड पिक सेशन में था। सो अब तक के सबसे कम ( सार्वजनिक) कपडों में बर्लिन में फोटो सेशन करती नजर आईं.. क्या पता कल वे ही इसे इश्यू बनवा दें और पिंक पैंथर बगैर प्रमोशन के इतना नाम तो कमा ही जाए कि घोर पिटी के टैग और घाटे से बाहर आ जाए, ताकि आगे गुंजाइश बनी रहे खैर... देखते चलिए वक्त के इम्तिहान अभी और बाकी हैं। दुकानें बहुत हैं बच के चलें... समझदारी ओवरफ्लो हो तो अपनी भी सजा लें... टेपे हर कैटेगिरी में मिलते हैं, चाहिए बस एक ढंग का दुकानदार... जय हो... जय हो

Monday, December 1, 2008

बिल्कुल ठीक बोला, कुत्तों बाहर निकलो...

ये नेता न शहीद के घर जाने के काबिल हो न सदन बैठने के...
मुंबई में आतंकी हमले को अपने सीने पर झेल कर देश की आर्थिक राजधानी को चैन बख्शने वाले शहीदों की चिता की राख भी ठंडी नहीं पडी है और कि नेताओं के गंदे दिमाग में इस आग में अपनी रोटिंयां सेंकने के बेशर्म आइडिए बयानों की शक्ल में बाहर आने लगे हैं। मुंबई में शहीद हुए एनएसजी कमांडो मेजर संदीप उन्नीकृष्णन के घर जो कुछ हुआ वह इसकी बानगी भर है। सोमवार को केरल के खिसियाए मुख्यमंत्री वीएस अच्युतानंद ने सोमवार को एक निजी चैनल पर कहा मेजर संदीप के पिता को यह सोचना चाहिए था कि हम यहां पर सहानुभूति जताने आए हैं अगर उनके बेटे ने देश के लोगों की रक्षा के लिए अपनी जान कुर्बान नहीं की होती तो उनके घर कोई कुत्ता भी नहीं आता। उल्लेखनीय है कि मुख्यमंत्री शहीद उन्नीकृष्णन के घर पर सहानुभूति प्रदर्शित करने गये थे, लेकिन उन्नीकृष्णन के पिता ने क्रोध में उन्हें बाहर निकलो कुत्तो कहकर भगा दिया था। अच्युतानंदन की मूर्खताभरी चालकी इसी से नजर आती है कि अगर उन्हें या उनके मंत्रीमंडल को शहीद परिवार की इतनी सच्ची फिक्र थी तो वे तीन दिन तक क्या कर रहे थे, जबकि मेजर की अंत्येष्टि भी हो चुकी थी। हकीकत तो यह है कि जब मीडिया ने उनकी घरघुस्सु घटिया मानसिकता को उजागर किया और उन्हें पता चला कि शहीद के घर जा कर भी इमेज बिल्डिंग हो सकती है तो वह मना करने के बावजूद पिछले दरवाजे से घुसने में भी बाज नहीं आए... खैर हुआ वही जिसकी आशंका था बहादुर बेटे के बाप ने पूजा स्थल को कुत्तों से चैक कराने वाले मौकापरस्त को बता दिया कि उनकी औकात एक आम आदमी के लिए क्या है। जब सरेआम बेइज्जती हुई तो वे बदला लेने पर उतारू हो गए और उन्नीकृष्णन के लिए कहा कि मेजर उनके बेटे नहीं होते तो कोई कुत्ता भी उनके घर झांकने नहीं जाता। इसका एक मतलब तो यह है कि सामान्यजन कुत्ते हैं और दूसरा यह कि किसी सामान्य आदमी के घर जाने वाले कुत्ते हैं।
घटियापन के दूसरे महान धार्मिक चित्र हैं हिंदुवादी मुखौटाधारी भाजपा के सेक्युलर मास्क मुख्तार अब्बास नकवी। वो पाकिस्तान को गरिया कर अपनी पार्टी को लाभ पहुंचाने की इस अंदाज में करते हैं कि जैसे मुस्लिम हो कर पाक को नापाक बताने से देश और जनता पर बडा भारी अहसान कर रहे हों। इसी चक्कर में कश्मीर के प्रदर्शनों और मुंबई के प्रदर्शनों में तुलना करते वक्त वो बोल बैठे जो किसी को सहन नहीं हो सकता। आतंक के सामने नाकाम रहने और घुटने टेकने वाले नेताओं की खाल उधेडने वाले प्रदर्शन पर उन्होंने एक टीवी चैनल से कहा कि मुंबई में नेताओं के प्रति जो गुस्से की बात कही जा रही है वह लिपिस्टिक, पाउडर लगा कर, सूट पहन कर किया जा रहा दिखावा मात्र है। यह मुद्दा बदलने की कोशिश है। नकवी ने जनता को निशाना बनाते हुए कहा कि यह पता लगाया जाना चाहिए कि लिपस्टिक-मेकअप लगाए हुए वे महिलाएं और सूट-बूट पहने वे पुरुष कौन थे, तो पश्चिमी सभ्यता के अनुसार सरकार विरोधी प्रदर्शन कर रहे थे। हास्यास्पद बात यह है कि इस दौरान स्वयं नकवी सूट-बूट पहने हुए थे।

Monday, November 24, 2008

साध्वी के हौसले को सलाम... कहां मर गए मानवाधिकार वाले?

साध्वी के सम्मान के मदॆन की खबरें लगातार आ रही थीं, लेकिन सिवाए मौकापरस्त नेताओं के किसी की चूं तक सुनाई नहीं दे रही थी। कुछ एक ब्लागरों ने फ्रंट संभाला तो कुछ संत-संन्यासियों ने भी साहस का परिचय देने की कोशिश की, लेकिन चार राज्यों के चुनाव और राजनीति के नक्कारखाने में कोई आवाज पुरजोर नहीं हो पाई। सोमवार को जब साध्वी का यह आरोप सामने आया कि एटीएस ने उनके कपड़े उतारने की धमकी दी और गालियों से बात कर और बेल्ट-जूतों से मारा तो लगा कि एटीएस की बेकरारी बेसबब नहीं है। आखिर नतीजों तक पहुंचने और मकोका लगाने की इस जल्दी का कोई तो राज होगा। दरअसल मकोका लगने के बाद जो समय बचेगा वह लोकसभा चुनाव के पास खत्म होगा, यानी दो चुनाव एक दांव... फिर भी साध्वी ने जो धैयॆ दिखाया है वह काबिल-ए-तारीफ है, लेकिन मैं जानना चाहता हूं कि कहां मर गए वो मानवाधिकार के पुरोधा जो तथाकथित प्रगतिशीलता के नाम पर चाहे जिस मुद्दे पर स्थायी भाव से टिप्पणी और प्रदशॆन करते नजर आते रहे, शायद कम्युनिस्टों की आवाज बंद हो गई है और कांग्रेसीजनों को इसमें किसी प्रकार की बुराई नजर नही आ रही होगी। भाजपाई इसे पोलेटिकल मुद्दे की तरह सावधानी से संभाल कर चल रहे हैं कि मौका पड़े तो छुटकारा पाया जा सके, लेकिन जेल संहिता, मानवाघिकार, धमॆ, कानून और नैतिककी की बात करने वाले किस कोने में जा छिपे हैं, लग तो यूं रहा है जैसे उनके आकाओं ने गायब होने का फरमान सुना दिया हो।या सबके सब एक साथ मर गए हों ॥ खैर कितनी देर और दिन तक मरे हुए जमीर के लोगों का मुरदा देश सोता रहेगा... सारे लोग जागे न जागें कुछ लोग भी जाग गए तो.. यकीन जानना न्याय होगा... साध्वी के साथ भी और मालेगांव धमाके के पीडितों के साथ भी..लेकिन अगर कोई नहीं बच पाएगा तो वह होंगे इस कांड के नाम पर फिजाओं में जहर घोलने वाले.. चाहे फिर वह अफसर हों या परदे के पीछे खेल दिखाने वाले नेता... नतीजे बेशक जो चाहे हों, लेकिन आदमियत तभी बची रहेगी जब इतने गंभीर आरोपों वाला कांड मीडिया की टीआरपी और रीडरशिप का फंडा न बने और न ही नौकरशाही और नेतृत्व उसका मनचाहा इस्तेमाल कर सके।

Wednesday, November 5, 2008

काले प्रेसिडेंट के ताज में मुशिकलों के मोती

ओबामा ने जीत दजॆ की। अच्छा लगा। अमेरिका में पहले अश्वेत प्रेसिडेंट होने के गौरव ने नस्लभेदी अमेरिका में जीतते नजर आते लोकराज में बेशक एक नई हवा को बहने का रास्ता दिया हो, लेकिन असली इम्तहान बाकी है। पिछले एक दशक से कई समस्याओं से जूझते अमेरिका में खोखली होती अथॆ व्यवस्था, बेलगाम नई पीढ़ी और अपने आप को बचाए रखने के लिए दुनिया पर मजबूरी की चौधराहट इस देश को किस दिशा में ले जाएगी, अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी। बहरहाल बराक ओबामा जाहिर तौर पर नौसिखिए हैं और संकट के बादल गहरे तब डूबते अमेरिका की असफलताओं का ठीकरा कहां फूटेगा यह समझना आसान है। वैसे भी डायलेसिस पर चल रही अथॆवव्यस्था को जिंदा रखने के लिए अमेरिका पूंजीवाद का पल्लू छोड़ कर समाजवाद और साम्यवाद जैसी लगती एक नई व्यवस्था की तरफ एक कदम बढ़ा चुका है और बैंक से लेकर व्यापार और बीमा जैसे सेक्टर को वह सभी यथा संभव सहायता दे रहा है। लेकिन बाजारों से कैश फ्लो सूख रहा है और कजॆ वसूली न होने से बैंकों की सांसे उखड रही हैं। शायद यही कारण है कि ओबामा आउटसोसिॆग जैसी चीजों में भारत आदि को रोकने का एलान कर रहे हैं, पर यह वैसी ही कोशिश है जैसे कोई यह समझे की ओस की बूंदों से जंगल की आग रुक जाएगी। वैसे भी ओबाम नेता कम मदारी ज्यादा नजर आते हैं, और लोगों को बरगलाने में भारतीय नेताओं से भी आगे नजर आते हैं, इसिलए कभी हनुमान की प्रतिमा तो कभी गांधी की तस्वीर बेचारे भारतीय इतने में ही फूल नहीं समां रहे हैं। ओबाम ने इस प्रकार के कई टोटके लगभग सारी प्रभावशाली कम्युनिटिज को बहलाने में अपनाए। उन्हें सफलता भी मि्ली लेकिन इसकी कीमत क्या होगी और कौन चुकाएगा अभी हिसाब होना बाकी है।